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Murari Mahaseth

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कुछ चलें हैं कुछ बाकी हैं,
कुछ और को पहुंचना हैं,
मुकाम के इस दौर में,
आगे सभी को जाना हैं |

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Murari Mahaseth

  1. 1. -मुरारी महासेठ मंज़िल की ओर कु छ चलें हैं कु छ बाकी हैं, कु छ और को पहुंचना हैं, मुकाम के इस दौर में, आगे सभी को जाना हैं |
  2. 2. -मुरारी महासेठ कु छ ठोकर खा के बैठे हैं, कु छ ददद सह के सहमे हैं, फिर भी ननराश न होना हैं, सदा आगे ही जाना हैं |
  3. 3. चाहे मंज़िल हो कांटो से निरा, या राहों में हो पत्थर बबछा, हर काम कठठन रही हैं, पर ज्यादा ठदन न ठटकी हैं | -मुरारी महासेठ
  4. 4. कोई-न-कोई ननहारा हैं, फिर उसको सरल बनाया हैं, "उसने" भी देखा था वो मंिर, सिल हुआ कर श्रम अंत तक | -मुरारी महासेठ
  5. 5. इक ससख दी "उसने" हमें, हम भी फकसी से कम नहीं, अभी शेष हैं वो रहस्य ज़जसे कर सकते हम सदृश्य, पथ से जंजीर हटाकर बन सकते हैं ठदवाकर | -मुरारी महासेठ
  6. 6. ननष्कषद यही हम पाते हैं, कोई काम था न जठटल, न है, और हम चाहें तो, मंज़िल पास ले आएंगे | -मुरारी महासेठ
  7. 7. -मुरारी महासेठ

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