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Vividh angi vividh yog

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various yoga, limbs of yoga, parts of yoga, raja yoga, bhakti yoga, karma yoga, gyan yoga, etc

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Vividh angi vividh yog

  1. 1. विविध अंगी विविध योग
  2. 2. योग माने की . . . योगवासिष्ट के मुतासिक  िंिारोत्तरणे युस तयोगशब्देन कथ्यते। भगवद गीता के मुतासिक  िमत्वं योग उच्यते। योग का उĥेश्य और सवसवध प्रकार कममयोग भसि योग ज्ञानयोग  राजयोग जपयोग मंत्रयोग हठयोग नादयोग/ लय योग
  3. 3. कममयोग
  4. 4. कममयोग इिमेंकोई िंशय नहीं की कोई भी मनुष्य सकिी भी वि क्षणभर िुद्दा कममकरते रहता है । योंसक वह प्रकृसत के गुणों िे पराधीन होने के कारण कममकरने का सहस्िा िन जाता है। योगः कममिु कौशलम् ।
  5. 5. कममयोग  कमम का कम िे कम िंचय करके जन्म मरण के फे रे िे िहार सनकलना और परमात्मा मेंसवलीन होने का प्रयाि याने योग और परमात्मा मेंसवलीन होना भी योग . . .  योग ही िाधन हैऔर योग ही िाध्य ।
  6. 6. कममयोग  कममके मागम में–  स्वधममिमज के करना  िमरि हो के करना  कुशलता िेकममकरना – शरीर और सचत्त  िमत्व िुसद्द िेकरना और कममफल का त्याग करना
  7. 7. कममयोग  कममयोग के टप्पे (steps)  दृविकोण विशाल हो जाता है  योग के आधीन वकये गये कमम सेसमाज का कल्याण होता है  अहंकार का धीरे धीरे नाश होता है  वित्तशुवि होती है  ब्रह्मज्ञान की प्रावि होती है  Over a period of time विया वकये बगैर कमम आपोअप होता है होने का अहसास होता है|
  8. 8. भवियोग
  9. 9. भवियोग  भसि का मतलि है– ईश्वरके असस्तत्व की िवमत्र और ितत जाणीव और उिके प्रसत आत्मिमपमण करना । पंसित श्रीपद शास्त्री सकं जविेकर –  अंतर मेंप्रेम, सवचारोंमेंपसवत्रता और आचरण मेंशुद्दता जो भसि िे सनमामण होती हैवह भसि प्रत्येक मनुष्य की प्रचंि शसि है।
  10. 10. भवियोग  नारदमुसन की भसि की पररभाषा – नारदस्त तदसपमता सिला चारता । तद सवस्मरणेपरमव्या कुलतेसत ॥ ना. भ. िूत्र १९  अपने िारे आचार सवचार प्रभु को अपमण करो और जि प्रभु का सवस्मरण हो ति अत्यंत व्याकुल हो जाना यह भगवंत की परम भसि
  11. 11. भवियोग  भसि का मागम– नवधा भसि श्रवणं कीतमन सवष्णो: स्मरणं पादिेवनम । अचमनं वंदनं दास्यं िख्यामात्म सनवेदनम ॥
  12. 12.  भसि के भाव –  शांत – सभष्म  दास्य – हनुमान  िाख्य – अजमनु  वात्िल्य – यशोदा  माधुयम - राधा भवियोग
  13. 13. भवियोग  भसि योग की सवसशĶता  Simple compare to other Yog –  राजयोग मेंशरीर िौष्टव;  ज्ञानयोग मेंवैराग्य;  कममयोग मेंउत्िाह िेकाम करने की क्षमता  परन्तु भसि योग में– सनरपेक्ष सनव्यामज प्रेमभावना
  14. 14. ज्ञानयोग
  15. 15. ज्ञानयोग  मैंकौन ह ूँ।  स्थल और काल की मयामदा नहीं ऐिेशाश्वत ित्य या है, ऐिेतत्त्वज्ञान के प्रश्न कर के उिके उत्तर, सचंतन, मनन द्वारा ढूूँढना ।  इिके सलयेिाधक गुरु ग्रंथ और स्वाध्याय का आधार लेतेहै।  अंसतम फल – ब्रह्मज्ञान की प्रासि ।
  16. 16.  िमथम के मुतासिक - ज्ञानयोग एक ज्ञानाचेलक्षण । ज्ञान म्हसणजेआत्मज्ञान । पहावेआपणासि आपण । या नावे ज्ञान ॥  योग िाधना िेिुद के शुद्द स्वरूप का पररचय और आत्मशसि की पहचान मतलि के स्वरूपज्ञान या तो आत्मज्ञान की प्रासि ।
  17. 17. Different path of yog selected to achieve the eternal has same requirement and result  सनरंतर और दीर्मकाल पयमन्त िाधना  सचत्तशुसद्द  सनरंतर आसण दीर्मकाळ िाधना  ज्ञानप्रासि
  18. 18. राजयोग
  19. 19. राजयोग  पतंजसल के अĶांग योग को ही राजयोग कहते है।  पतंजसल के मुजि –  योगसित्तवसृत्तसनरोधः । प.यो.ि.ू१.२ ॥
  20. 20. राजयोग  राजयोग – िसहरंग योग िाधना ।  यम: िमाज मेंरहने के िाथ पालने के सनयम ।  सनयम: व्यसि को अपने जीवन मेंपालने के सनयम ।  आिन: शारीररक स्तर पेजो सस्थर और िुिमय है।  प्राणायम: श्विन सनयंत्रण िेमनो सनयंत्रण; प्राणशसि का अनुभव ।
  21. 21. राजयोग  राजयोग – अंतरंग िाधना  प्रत्याहार: िवम इसन्ियों को िाहर के सवषय िेअंतरंग तरफ मोड़ना |  धारणा: सचत्त को एक सवषय पर सस्थर करने का प्रयत्न |  ध्यान: धारणा के सवषय मेंलंिे िमय तक सचत्त एकाग्र रिना  िमासध: ज्ञान प्रासि ; कै वल्य प्रासि
  22. 22.  योग का प्रवाि : राजयोग स्थूल िेिूक्ष्म तक और िूक्ष्म िेअनंत की तरफ
  23. 23. जप योग
  24. 24.  अंतरंग योगसाधना की पूिम तैयारी  महत्त्ि के अंग -  वलवित  िाविक (िैिरी) - उच्िार स्थान – मुख; मध्यमा (कंठ); पश्यन्ति (हृदय); परा (नाभि)  मानवसक  उपांशु जप  अजपाजप जप योग
  25. 25.  िमथम के मुतासिक, जप योग श्वािािरोिर र्ेता िो | िोसिता अहम | ऐिेचाले| िोिहम् िोिहम् ||  कोई भी पद्दसत (method) िेकरे, अल्प िमय के सलये करे , पर िमरि हो के करे
  26. 26. मंत्र योग
  27. 27. मंत्र योग  मंत्र योग  मंत्र के द्वारा मन को अंदर की तरफ मोड़ना  शब्दप्रधान या तो ध्वसन प्रधान मंत्र  ध्वसनप्रधान मंत्र – कं पन पैदा करना –स लं, ह्रीं, etc  शब्दप्रधान – ॐ नमः सशवाय:  ध्वसन िे ज्यादा शब्द और शब्द िे ज्यादा भाव
  28. 28. हठ योग
  29. 29. हठ योग  ह – िूयम वाचक, ठ – चंि वाचक  िूयम और चंि, येदोनों जीवन के द्वन्द्व का प्रसतक है  िूयम नािी और चंि नािी, येदोनों का िंतुलन पाकर िुषुम्ना नािी को जागृत करना है  हठयोग की िाधना द्वारा येद्वन्द्व पेसनयंत्रण पाना है  योग की िाधना िेसशव और शसि का समलन  राजयोग मेंप्रगसत होती है
  30. 30. नाद योग / लय योग
  31. 31. नाद योग / लय योग  नाद िेअनुिंधान  नादयोग की िूक्ष्म ध्वसन लहेरों िे जुड़ना  अवणमनीय आनंद की अनुभूसत  मन और मज्जािंस्था पर िुिमय सवश्रांसत का अनुभव  मत्रंयोग और हठयोग द्वारा कंुिसलनी शसि जागतृहोती ह,ैउिकेशरण मेंजाना और शसि िेजड़ुना ति सचत्तवसृत्त का लय होता है– उिेलय योग कहतेह|ै  नाद एक अनाहत नाद का प्रकार और सचत्त का लय  मन शांत और सनसवमचार  िंकल्प लेने की सस्थसत का सनमामण  िाधना में प्रगसत का अहिाि
  32. 32. Summary  स्वभाव के अनुिार सवसवध योग की उपयोसगता  सियाशील व्यसि – कममयोग  िंवेदनशील व्यसि – भसियोग  िंयमशील व्यसि – राजयोग  सचंतनशील व्यसि – ज्ञानयोग
  33. 33. || हरी ॐ ||

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